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The exam consists of three stages – Prelims, Mains, and Interview – each demanding different skill sets and thorough knowledge. The competition is fierce, with lakhs of aspirants vying for a limited number of vacancies. Success hinges not just on academic knowledge but also on strategic planning, resilience in the face of setbacks, and a strong sense of purpose.

Today, we share the success story of IFS Pujya Priyadarshini that will inspire those who aspire to become an Officer in the Indian Administrative Services.

After graduating with a B.Com degree in Delhi, Pujya Priyadarshini decided to pursue her studies further at Columbia University in New York, specializing in Public Administration. She had a promising job offer after completing her post-graduation, but her heart was set on a different path: becoming an IFS officer. This dream inspired her to diligently prepare for the UPSC exams.

Her journey began with her first attempt in 2013, but unfortunately, it ended in disappointment. Undeterred, she took a three-year break before trying again in 2016. This time, she successfully cleared the Prelims and Mains, but the interview round proved challenging, leading to another setback.

Despite these obstacles, Pujya remained determined. In 2017, she made her third attempt and came closer to success, yet victory still eluded her grasp, causing her to doubt her aspirations. However, with the unwavering support of her loved ones, she resolved to give it one final try.

Her perseverance finally paid off in 2018 when she secured an impressive AIR-11 rank, achieving her dream of becoming an IFS officer.

Reflecting on her journey, Pujya Priyadarshini emphasizes the importance of resilience in the face of failure. She advises aspiring candidates to see setbacks as opportunities for personal growth and to persistently pursue their goals with unwavering dedication.

Pujya’s story is a testament to the power of determination and the belief that with persistence and support, dreams can indeed come true. Her journey from Delhi to Columbia University and eventually to the esteemed ranks of the IFS is an inspiring tale for anyone striving to achieve their ambitions. Her advice to never give up and to learn from every setback resonates not only with UPSC aspirants but with anyone facing challenges in pursuit of their dreams.

As she looks forward to her career in the Indian Foreign Service, Pujya Priyadarshini continues to inspire others with her story of grit, determination, and unwavering faith in her dreams.

IAS Isha Duhan: तेज–तर्रार IAS अफसरों में होती है गिनती
हम बात कर रहें है महिला आईएएस ईशा दुहां (Isha Duhan) की, जो अभी हाल ही में यूपी के चंदौली जिले की की नई डीएम बनी है। ईशा दुहन की गिनती तेज-तर्रार आईएएस अधिकारियों में होती है। ईशा 2014 बैच की IAS Officer के रूप में बतौर डीएम पहली पोस्टिंग है। इससे पहले वह असिस्टेंट मजिस्ट्रेट के रूप में मेरठ, मुख्य विकास अधिकारी के पद पर बुलंदशहर और मेरठ में काम कर चुकी हैं और वर्तमान में वाराणसी में वाराणसी विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद पर कार्य कर रही थी। ईशा की गिनती तेज–तर्रार आईएएस अफसरों में की जाती है तथा उन्हे कड़ी फैसले लेने के लिए जाना जाता है। अभी हाल ही में हुए तबादलों में ईशा दुहन (IAS Isha Duhan) को चंदौली की कमान सौंपी गयी है
हरियाणा की रहने वाली हैं IAS Isha Duhan
हरियाणा के पंचकुला की रहने वाली ईशा दुहन ने पटियाला से बी टेक बायोटेक्नोलॉजी करने के बाद सिविल सर्विसेज़ के क्षेत्र में जाने का निश्चय किया और पहले ही प्रयास में 59वीं रैंक हासिल किया। वाराणसी में लेडी सिंघम के नाम से मशहूर ईशा दुहन का नाम भू माफियाओं के लिए बुरे सपने से कम नहीं था

भू माफियाओं से अकेले लिया था लोहा

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बतौर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट वाराणसी के राजातालाब की SDM रहने के दौरान सरकारी तामझाम से दूर IAS Isha Duhan 2017 में अकेले ही खनन माफियाओं से लोहा लेने निकल पड़ी थी। ग्रामीणों की मदद से उन्हें पकड़ भी लिया। इसके अलावा राजातलाब तहसील में एसडीएम पद के दौरान एक व्यक्ति द्वारा पान खाकर उनके कक्ष में घुसना उसे भारी पड़ गया था। आईएएस ईशा दुहन ने उसे फटकारते हुए उसपर 500 रुपये का जुर्माना भी लगाया था।

IAS ईशा दुहन का 17 अप्रैल 2018 को बनारस से तबदला हुआ था। उन्हें बुलंदशहर का सीडीओ बनाया गया था। ईशा दुहन ना सिर्फ एक तेज-तर्रार IASअफसर हैं, बल्कि वाराणसी जिला प्रशासन की ये युवा सदस्य भविष्य की काशी के निर्माण संबंधी योजनाओं में अहम भूमिका निभा चुकी हैं।
वीडीए उपाध्यक्ष रहने के दौरान कई अवैध निर्माणों पर बुल्डोजर चलवा चुकी हैं। दबंग लेडी IAS अफसर ईशा दुहन की जनता में छवि जनप्रिय अधिकारी के रूप में है। ईशा दुहन अपने पिता से काफी प्रभावित रहीं हैं। इनके पिता ईश्वर दुहन आईटीबीपी में डीआईजी रह चुके हैं।

पुरुष प्रधान दुनिया में अगर हर महत्वपूर्ण पद पर महिला बैठी हो तो आप क्या कहेंगे? ऐसा हुआ है कानपुर देहात जिले में। यहां इस समय ज्यादातर महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी महिलाएं संभाल रही हैं। डीएम नेहा जैन, एसपी सुनीति, सीडीओ सौम्या पांडेय, कई एसडीएम, बीएसए और जिला पंचायती राज अधिकारी भी महिला हैं। ‘ऑल विमिन टीम’ की सदस्य एसपी सुनीति कहती हैं, किसी महत्वपूर्ण पद पर महिला अधिकारी के होने से समन्वय बढ़िया होता है। कोशिश रहती है कि अच्छा कर पाएं।
बात समझाना होता आसान:
कुछ साल पहले डीएम, एसपी और सीडीओ के पद पर महिलाओं की तैनाती के बाद उन्नाव जिला चर्चा में आया था। बीते दिनों एसपी के पद पर आईपीएस अधिकारी सुनीति की तैनाती के बाद जानकारों की नजर कानपुर देहात जिले पर गईं। अब ज्यादातर महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं हैं। बातचीत में पुलिस-प्रशासन से जुड़ी सारी महिला अधिकारी इस बात पर खुशी जताती हैं। हर अधिकारी का कहना है कि दूसरे किसी पद पर महिला अधिकारी के होने से अपनी बात कहना और समझाना काफी आसान हो जाता है।

अच्छा है समन्वय:
एसपी सुनीति कहती हैं कि मेरी इस बारे में डीएम नेहा जैन से चर्चा भी हुई है। हम चाहते हैं कि चीजें और बेहतर हों। जिले के लिए कुछ अच्छा कर पाना जरूरी है। लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। हर चुनौती जीवन का अंग है। वह कहती हैं, जब औरैया में एसपी थी तो बेटा 8 महीने का था। इस वक्त बेटी 9 महीने की है। मैं जिले के साथ परिवार को भी मैनेज कर लूंगी। परिवार के सहयोग से सब कर पा रही हूं।
काम करने में आसानी:
सीडीओ सौम्य पांडेय भी इसे एक अवसर की तरह देखती हैं, वह कहती हैं, महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। मैं भाग्यशाली हूं कि इस टीम का हिस्सा हूं। महिलाओं के लिए बनाए आगे बढ़ रही हैं। मैं भाग्यशाली हूं कि इस टीम का हिस्सा हूं। महिलाओं के लिए बनाए
यूपीसीडा में थी अपर कार्यपालक पद पर तैनात
कानपुर देहात की नवागत जिलाधिकारी बनीं 2014 बैच की आईएएस नेहा जैन यूपीसीडा में अपर कार्यपालक पद पर तैनात थीं। पूर्व में ट्रेनिंग के दौरान वह आगरा तैनात रही हैं। इसके बाद उन्होंने लखनऊ में एसडीएम व फिरोजाबाद में मुख्य विकास अधिकारी के तौर पर जिम्मेदारी संभाली। उनके साथ काम करने वाले लोगों ने बताया कि वह अपने काम के प्रति बेहद ईमानदार है और हर काम समय पर करने कि उनकी आदत है।
कानपुर से है गहरा नाता
कानपुर देहात की नवागत जिलाधिकारी बनी नेहा जैन का कानपुर से बहुत गहरा नाता है। कानपुर में उनकी पूरी स्कूलिंग हुई है। उनके माता-पिता कानपुर में ही रहते हैं। उनके पिता आर.सी गोयल वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं।उनका स्वभाव मिलनसार एवं मृदुभाषी है। वह बेहद ईमानदार व सरल स्वभाव की हैं।
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि रिजर्व बैंक और अन्य एजेंसियां अपना काम कर रही हैं। रिजर्व बैंक ने कल शुक्रवार को ही इस बारे में बताया था कि उसने सभी सरकारी बैंकों से सूचनाएं मांगी हैं।
निर्मला सीतारमण ने कहा कि रेगुलेटर अपना काम कर रहे हैं। आरबीआई ने बयान दिया। एलआईसी ने अपने एक्सपोजर (अडानी समूह को) के बारे में बताया। रेगुलेटर आजाद है, जो उचित है उसे करने के लिए सक्षम हैं ताकि बाजार अच्छी तरह से चलता रहे।

अडानी विवाद एक राजनीतिक फ्लैशप्वाइंट में बदल गया है। विपक्ष ने अदालत की निगरानी में जांच या आरोपों की संयुक्त संसदीय समिति की जांच की मांग की है। वित्त मंत्री ने शुक्रवार को कहा था कि भारत का वित्तीय क्षेत्र बहुत अच्छी तरह से विनियमित है और मात्र एक उदाहरण से उसे हिलाया नहीं जा सकता। वित्त सचिव टीवी सोमनाथन ने भी शुक्रवार को कहा था कि व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से यह स्थिति बस “चाय के प्याले में तूफान” की तरह है। शनिवार को, उन्होंने कहा कि वह अपने बयान पर कायम हैं।
हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बाद से अडानी कंपनियों के शेयरों की क़ीमतें धड़ाम गिरी हैं और इससे समूह का मूल्य क़रीब आधा ही रह गया है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद से अब तक क़रीब 120 बिलियन यानी 1.2 ख़रब डॉलर का नुक़सान हुआ है।
हिंडनबर्ग रिसर्च ने उद्योगपति गौतम अडानी की कंपनियों पर स्टॉक में हेरफेर और लेखा धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हमने अपनी रिसर्च में अडानी समूह के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों सहित दर्जनों व्यक्तियों से बात की, हजारों दस्तावेजों की जांच की और इसकी जांच के लिए लगभग आधा दर्जन देशों में जाकर साइट का दौरा किया। हालाँकि अडानी समूह ने उन आरोपों को खारिज कर दिया।
रिपोर्ट आने के बाद अडानी समूह को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। अब भारतीय स्टॉक एक्सचेंज ने अडानी एंटरप्राइजेज सहित अडानी समूह की कम से कम तीन कंपनियों को बीएसई और एनएसई की निगरानी में डाल दिया है।अडानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और झटका लगने जा रहा है। S&P डाउ जोंस ने कहा है कि वह अडानी समूह की प्रमुख फर्म अडानी एंटरप्राइजेज को 7 फरवरी से अपने इंडेक्स से हटा देगा। डाउ जोंस ने तमाम मीडिया विश्लेषण और हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट आने के बाद पहली बार यह घोषणा की है।
]]>लेकिन नामों को बदलने का एक तर्क होता है, उसके पीछे राजनीतिक और सांस्कृतिक नीयत होती है। बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार जब नाम बदलने की राजनीति करती है तो उसकी भी एक नीयत दिखाई पड़ती है जो चिंताजनक है। वह मूलतः दो तर्कों का हवाला देती है- एक तर्क यह होता है कि गुलामी की स्मृति से मुक्ति पाने की ज़रूरत है और दूसरा तर्क यह होता है कि भारत का जो स्वर्णिम अतीत है, उसकी विरासत को जीवित रखा जाना ज़रूरी है।
लेकिन ये दोनों तर्क इस तथ्य की उपेक्षा करते हैं कि अतीत या स्मृति कोई कटी-छँटी चीज़ नहीं होती जिसे आप किसी पौधे की तरह अपने सांस्कृतिक गमले में सजा लें। उसका एक अविच्छिन्न सिलसिला होता है जिसमें बरसों नहीं, सदियों की हवा-मिट्टी और पानी का संस्पर्श शामिल होता है। बहुत संभव है कि इस अविच्छिन्नता में बहुत सारे तत्व आपको नापसंद हों या नागवार गुज़रें, लेकिन इतने भर से उनकी हक़ीक़त मिट नहीं जाती। ख़ास कर भारत जैसे देश में, जहाँ पांच हज़ार साल की एक अविच्छिन्न सभ्यता दिखाई पड़ती है, वहां स्मृति और विरासत के नाम पर यह खेल दरअसल इस सभ्यता की स्वाभाविकता को काटने का, उसे कमज़ोर करने का खेल बन जाता है।
जब मुग़ल गार्डन का नाम अमृत उद्यान किया जाता है, या जब इलाहाबाद को प्रयागराज बनाया जाता है या फिर जब मुग़लसराय को दीनदयाल उपाध्याय नगर में बदला जाता है तो ऐसे प्रयत्नों की अस्वाभाविकता बहुत साफ़ दिखाई पड़ती है। इलाहाबाद का प्रयागराज से कोई बैर नहीं है। दोनों साथ-साथ हम सबकी स्मृति में जीवित हैं। ऐसी साझा स्मृति का दूसरा उदाहरण बनारस और काशी हैं। लेकिन जब आप इलाहाबाद को मिटा कर प्रयागराज को स्थापित करना चाहते हैं तो दरअसल, आप स्मृति के एक हिस्से को- जो कम से कम एक हज़ार बरस का है- काट कर- उस संस्कृति का वर्चस्व बनाना चाहते हैं जो दरअसल फ़िलहाल कहीं अस्तित्व में नहीं है। इसके बाद इलाहाबाद पूछता है कि वह अपने अमरूदों का क्या करे, अपने उस विश्वविद्यालय को किस नाम से पुकारे जिसे कभी पूरब का ऑक्सफोर्ड कहते थे और अपने शायर अकबर इलाहाबादी को किस नए नाम से जाने, जिन्होंने अपनी शायरी में अंग्रेज़ियत और आधुनिकता दोनों की जम कर ख़बर ली थी।
ठीक है कि मुग़ल गार्डन के पास ऐसे सवाल नहीं होंगे। उसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं है। लेकिन मुग़ल गार्डन बोलते ही जो स्मृति सिर उठाती है, क्या अमृत उद्यान नाम से वैसी कोई स्मृति है?
ठीक है कि मुग़ल गार्डन के पास ऐसे सवाल नहीं होंगे। उसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं है। लेकिन मुग़ल गार्डन बोलते ही जो स्मृति सिर उठाती है, क्या अमृत उद्यान नाम से वैसी कोई स्मृति है?
अमृत उद्यान नाम दरअसल यह संदेह पैदा करता है कि सांस्कृतिक शुद्धतावाद की जिस अधकचरी अवधारणा को बीजेपी अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल की तरह स्थापित करने में लगी है, उसके तहत उसने एक तत्सम शब्द-युग्म के सहारे यह नाम चुन लिया है।
मगर यह संदेह फिर भी छोटा है। ज़्यादा बड़ा संदेह यह है कि दरअसल बीजेपी और संघ परिवार को पूरे मध्यकाल से समस्या है। इस मध्यकाल में संस्कृत नहीं बोली जाती, कबीर पंडितों और मुल्लों का मज़ाक बनाते हैं, मीरा प्रेम के नाम पर बग़ावत करती नज़र आती हैं, रसख़ान और जायसी कृष्णकथा कहते मिलते हैं और कुंभनदास और रैदास जैसे कवि अपने स्वाभिमान को अपना मूल्य बनाते हैं। इसी मध्यकाल में नानक मिलते हैं जो एक नया पंथ शुरू कर डालते हैं। इस मध्यकाल में ताजमहल, लाल क़िला और जामा मस्जिद जैसी शानदार इमारतें बनती हैं, अमीर खुसरो से लेकर तानसेन तक आते हैं। गांधी इसी मध्यकाल से प्रेरणा ग्रहण करते हैं, अपने भजनों की किताब में मध्यकाल का साहित्य भर डालते हैं और ख़ुद को जुलाहा बताते हैं।
बेशक, इस मध्यकाल में एक बड़ी सांस्कृतिक उपस्थिति तुलसीदास की भी है। कुल मिलाकर यह मध्यकाल एक बड़े सांस्कृतिक प्रतिरोध और उद्वेलन का काल भी है जो किसी काल्पनिक स्वर्णकाल से ज़्यादा ठोस, ज़्यादा निरंतर और हमारी आधुनिकता के ज़्यादा क़रीब है। मगर बीजेपी की शब्दावली में यह पूरा दौर ग़ुलामी का दौर है जिससे निजात पाने की ज़रूरत है।
बीजेपी की सारी समस्या यही है। उसे अपने सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए वह काल्पनिक रामराज्य चाहिए, जहां लोग संस्कृत बोलने वाले हों, मुग़ल गार्डन में नहीं, अमृत उद्यान में घूमते हों और पूजा-पाठ और यज्ञ से राक्षसों और दुष्टों को मार भगाने की विधियाँ विकसित करते हों।
लेकिन इतिहास के ठोस तथ्य बीजेपी की इस कल्पनाशीलता का साथ नहीं देते। उसे समझ में आता है कि इसके लिए उसे अपना इतिहास और अपना मध्यकाल गढ़ना होगा। इसलिए वह अतीत में जाकर नए नायकों की खोज करती है, राणा प्रताप या शिवाजी को हिंदुत्व के उद्धारकों की तरह प्रस्तुत करती है और बाबर-अकबर से लेकर औरंगजेब और बहादुरशाह ज़फ़र तक को ख़ारिज करने की कोशिश करती है। यह मुग़लिया इतिहास उसे ख़ास तौर पर परेशान करता है। इसलिए वह मुग़लसराय का नाम दीनदयाल उपाध्याय नगर रखते हुए एक अजब सी दलील देती है- कि इसी शहर के रेलवे प्लैटफॉर्म पर दीनदयाल उपाध्याय का शव मिला था। निश्चय ही यह दुखद था, उनका ऐसा अंत नहीं होना चाहिए था, लेकिन बस इस आधार पर एक शहर का नाम बदल देना कितना उचित है? उनकी स्मृति अक्षुण्ण रखने के लिए उनकी मूर्ति लगाई जा सकती थी, उनके नाम पर कुछ संस्थान बनाए जा सकते थे, लेकिन एक पूरे शहर से उसका नाम छीन लेना कितना जायज़ है?
मुग़ल गार्डन का नाम परिवर्तन भी इसीलिए परेशान करता है। वह सांस्कृतिक आरोपण की एक बड़ी प्रक्रिया का छोटा सा हिस्सा है। लेकिन इस सांस्कृतिक आरोपण से हम क्यों परेशान हैं? क्योंकि बीजेपी यह जो नया सांस्कृतिक उद्यान बना रही है, उसमें बहुत सारे हिंदुस्तानियों के लिए जगह नहीं दिखती या दोयम दर्जे की जगह दिखती है। इस देश के दलित, आदिवासी, पिछड़े या अल्पसंख्यक इस सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के आगे या तो ख़ुद को असहाय पा रहे हैं या फिर छोटी-छोटी लड़ाइयाँ लड़ रहे हैं- उनके सामने उनके वजूद और गुज़ारे का संकट बड़ा होता जा रहा है।
मुग़ल गार्डन कोई जनता की चीज़ नहीं है। वह राष्ट्रपति भवन का हिस्सा है जिसे साल में एक बार आम लोगों की सैर के लिए खोला जाता है। लेकिन उसकी जगह जो अमृत उद्यान आ गया है, उसका नाम ही बहुत सारे लोगों को इसमें प्रवेश के लिए सांस्कृतिक तौर पर अनधिकृत या अवांछित बना डालता है। वैसे, एक सच यह भी है कि सरकारी नाम बदल जाने से जगहों के प्रचलित नाम आसानी से ख़त्म नहीं हो जाते। समय भी उन्हें एक मान्यता देता है। कनॉट प्लेस को राजीव चौक मिटा नहीं पाया, चांदनी चौक का कोई और नाम उसे बदल नहीं पाएगा, इलाहाबाद प्रयागराज के साथ बचा रहेगा और अमृत उद्यान के अलावा लोगों को मुग़ल गार्डन भी याद आता रहेगा। मगर सांस्कृतिक आरोपण के इस प्रयत्न के प्रतिरोध में इतनी भर तसल्ली पर्याप्त नहीं है, उसके व्यापक निहितार्थ समझने और उसकी काट खोजने की ज़रूरत है।
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यूपी सरकार के विशेष सचिव धीरेंद्र सिंह सचान प्रदूषण मुक्त पर्यावरण और स्वस्थ समाज का मैसेज देने साइकिल पर निकले. उन्होंने लखनऊ से कानपुर के बीच 72 किमी की दूरी को महज साढ़े तीन घंटे में पूरा किया.
यूपी सरकार के विशेष सचिव और साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ इण्डिया एवं उत्तर प्रदेश ओलंपिक एसोसिएशन के एसोसिएट उपाध्यक्ष धीरेन्द्र सिंह सचान रविवार को सड़कों पर साइकिल चलाते नजर आए. 52 वर्षीय धीरेंद्र सिंह सचान प्रदूषण मुक्त पर्यावरण और स्वस्थ समाज का मैसेज देने साइकिल पर निकले. उन्होंने लखनऊ से कानपुर के बीच 72 किमी की दूरी को महज साढ़े तीन घंटे में पूरा किया. कानपुर पहुंचने पर जाजमऊ गंगापुल पर उनका स्वागत किया गया. इस दौरान उन्होंने कहा कि शारीरिक श्रम से स्वस्थ और सेहतमंद समाज का निर्माण होगा और फिट इंडिया का अभियान गतिशील होगा.
उन्होंने बताया कि लखनऊ से सुबह चार बजे माउंटेन साइकिलिंग के जरिये साइकिल यात्रा शुरू की. करीब 19 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से उन्होंने 72 किमी का सफर तय किया. लखनऊ से कानपुर के बीच जगह जगह उन्होंने युवाओं को साइकिलिंग के लिए प्रेरित किया. इस दौरान जाजमऊ गंगापुल पर उप्र साइकिलिंग एसोसिएशन के सदस्यों ने उनका स्वागत किया.

बता दें कि धीरेन्द्र सिंह सचान उप्र साइकिलिंग एसोसिएशन के चेयरमैन भी हैं. इसके अलावा साइकिलिंग फेडरेशन आफ इंडिया (सीएफआइ) और उप्र ओलिंपिक एसोसिएशन के उपाध्यक्ष भी हैं. धीरेंद्र सचान खेलों में खास रुचि रखते हैं. वह मूलरूप से लालबंगला डिफेंस कालोनी में रहते हैं. उनके साइकिलिंग के साथ कई खेलों में योगदान की काफी चर्चा रहती हैं. उन्होंने बताया कि वाहन को प्राथमिकता देने से लोगों की सेहत और पर्यावरण को भी नुकसान होता है. साइकिलिंग शरीर को फिट रखने के साथ ही पर्यावरण के लिए भी हानिकारक नहीं होती.
]]>यूपी कैडर के एक और अफसर को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए रिलीव कर दिया गया है। मेरठ मंडल के कमिश्नर सुरेंद्र सिंह तीन साल की प्रतिनियुक्ति पर केंद्र चले गए हैं। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर कमिश्नर सुरेंद्र सिंह बड़ी जिम्मेदारी संभालेंगे। सुरेंद्र सिंह मेरठ के कमिश्नर के साथ ही सीईओ ग्रेटर नोएडा की भी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। सुरेंद्र लंबे समय तक वाराणसी के डीएम रहे हैं और इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सचिव पद पर भी तैनात थे।
मेरठ कमिश्नर के केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद अब यहां कमिश्नर और ग्रेटर नोएडा सीईओ के पद पर जल्द तैनाती होगी। 2005 बैच के आईएएस अफसर सुरेंद्र के केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद प्रदेश में बड़े स्तर पर कई तबादले हो सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक कई जिलों के जिलाधिकारियों के साथ-साथ कई मंडलों के मंडलायुक्त भी बदले जा सकते हैं। इसके अलावा शासन स्तर पर सचिव और विशेष सचिव रैंक के अफसरों के भी तबादले हो सकते हैं।
चार आईएएस और चार पीसीएस अफसरों के तबादले
यूपी सरकार ने रविवार को चार आईएएस और चार पीसीएस अफसरों का तबादला कर दिया है। आईएएस पवन कुमार और आशुतोष कुमार द्विवेदी को विशेष सचिव लोक निर्माण विभाग, रवींद्र कुमार-1 को विशेष सचिव आबकारी, धीरेंद्र सिंह सचान को विशेष सचिव, चिकित्सा एवं परिवार कल्याण बनाया गया है। सुनील कुमार सिंह और डॉ. अलका वर्मा को विशेष सचिव आवास, अभिषेक पाठक को प्रधान प्रबंधक सहकारी चीनी मिल संघ के पद पर तैनाती दी गई है। पिछले दिनों लगातार प्रशासनिक महकमे में फेरबदल हो रहा है।
One of the desired jobs among the Indian youth is to be an IAS (Indian Administrative Services) officer. Approximately 8 lakh candidates aspire to become IAS officers and serve the country. It is a tough journey from preparing for the IAS examination and to fulfil the responsibility of being an IAS officer. But to cross each milestone till you reach the final destination it is really important that you read about other IAS officers’ biography who can motivate you and can show you the right direction. Like we will discuss IAS Ishan Pratap Singh. He is counted to be among the candidates who cleared the IAS examination on the first attempt.
The fact that UPSC is one of the toughest exams in India, is not hidden from anybody. Hence, the candidates preparing for the IAS examination need a strong will to get through it. One of the success factors for Ishan Pratap Singh was strong will and determination.
He completed his schooling from DPS Noida with a percentage of 93.4 % in 12th Standard. When he planned to prepare for the UPSC Examination, he was pursuing his B.Tech in Electrical Engineering (Power) from one of the prestigious universities all over the world, ‘Indian Institute of Technology Delhi’. He was in the last year of his graduation, along with engineering he started the l.preparation for UPSC as well. Ishan has been a bright student academically and had confidence in his preparation as well.
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It is not easy for an engineering student to pursue the course and along with which to prepare for the UPSC examination. Students here have two choices, one is to leave the engineering classes behind and solely dedicate your day to the IAS preparation, or second is that you manage both and push yourself much harder to succeed in both fields. The choice that Ishaan made was the latter one where he was passionate about engineering so he decided to attend the classes along with the preparation. Ishan’s schedule for the day was as follows.
He was not just preparing, but he was preparing in the right direction, this is the reason he cleared the IAS examination in the first attempt and in a short span of time. His mantra for preparation was-
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Ishan Pratap Singh’s Optional subject was sociology. Being an engineering student why he chose sociology is a big question right? But it is suggested that you should choose a subject which interests you or for which you are passionate about. While Ishan was preparing for the IAS examination and he decided to focus on history, politics, and sociology, he read a few books. And the first book that Ishan read about sociology stirred up his interest in the subject and he dives deep into the subject. This is the reason he chose sociology as his optional subject. When you are passionate about something you will automatically be intrigued about it more and more.
Now comes the section for which you were waiting for eagerly. Here, is Ishan Pratap Singh Marksheet, through which you can see his excellent performance in the IAS examination
| Sections | Marks |
| Com M | 4 |
| Written Test | 869 |
| Personality Test | 193 |
| Final | 1062 |
Preparing for the IAS examination needs you to burn the midnight oil, if you are ready to do it, then only it is advised to a candidate that you should go for IAS preparation. IAS officers like Ishan Pratap Singh are the ones who fulfil their dream because they have a clear vision, and dedication to do it. You have a lot to learn from Ishan’s IAS journey. Ishan Pratap Singh posting is now at the Joint Magistrate’s office which is in Farrukhabad, UP(Uttar Pradesh, as an officer in the IAS cadre.
]]>-केन्द्रीय मंत्री उमा भारती के बेबी कहे जाने के बाद IPS अखिलेश चौरसिया चर्चा में आए थे। 22 दिसंबर, 2016 को जब उमा भारती झांसी पहुंची थी और उन्होंने जैसे ही अखिलेश को देखा तो कहा- \”तुम तो बिल्कुल बेबी लगते हो। कितनी उम्र है?\”
-2009 बैच के आईपीएस अखिलेश का जन्म 1 मई, 1983 में लखनऊ में हुआ था। वे कहते हैं, \”मेरे लिए यह पॉजिटिव बात है कि मेरी उम्र कम लगती है। अगर कोई फेयर एंड लवली या दूसरी फेयरनेस क्रीम का एड करना हो, तो मैं कर सकता हूं।\”
-मेरे दोस्त भी कहा करते थे कि मेरी उम्र कम लगती है। लखनऊ में स्कूलिंग के बाद मैंने एनआईटी, इलाहाबाद से बीटेक किया। 2005 में इंडियन आयल में इंजीनियर रहा। कुछ समय डीआरडीओ में भी रहा। लेकिन इन नौकरियों में मेरा मन नहीं लगा, इसलिए 2006 में दिल्ली से सिविल सर्विसेस की तैयारी शुरू की। -2007 में सबसे पहले IRS में सिलेक्शन हुआ, लेकिन मैंने उस जॉब को ड्राप कर दिया। साल 2009 में तीसरी कोशिश में IPS के लिए सिलेक्शन हुआ। 292 रैंक आई थी।
1 साल में इस IPS के हो चुके हैं 6 बार ट्रांसफर
-अखिलेश कहते हैं, ट्रेनिंग के बाद मेरी आजमगढ़, सीतापुर, आगरा में पोस्टिंग हुई। इसके बाद प्रतापगढ़ में एसपी रहा। मैंने अब तक की अपनी सर्विस को एन्जॉय किया है। लेकिन इतने कम समय में एक साल के अंदर 6-6 तबादले झेलने पड़े। आगरा पीएसी के बाद एसपी औरैया बनाया गया। 5 महीने बाद एटीएस, एसपी के तौर पर आगरा भेजा गया।
-लेकिन वहां भी सिर्फ एक दिन ही रह पाया। वहां एसपी एटीएस की एक ही पोस्ट थी, इसलिए एसपी इंटेलिजेंस, आगरा बना दिया गया। 11 नवंबर को मेरा ट्रांसफर झांसी में हो गया था इसके बाद सरकार बदलते ही एटा हो गया था। अब वे एटा के एसएसपी है।
वाइफ के साथ साल में एक बार जरूर जाते हैं घूमने
-अखिलेश की 18 जनवरी, 2014 में स्फूर्ति मिश्रा से शादी हुई थी। स्फूर्ति को वह पढ़ाई के दिनों से ही जानते थे। स्फूर्ति सेंट्रल एक्साइज में इंस्पेक्टर हैं। वह कहते हैं, मुझे घूमना पसंद है। साल में एक बार जरूर छुट्टी लेकर पत्नी के साथ बाहर घूमने जाता हूं। इसके अलावा बुक रीडिंग भी मुझे पसंद है।
-मेरा मानना है, नौकरी में ईमानदारी जरूरी है। सरकार से हमें सब कुछ मिलता है। घूसखोरी से बदनामी के सिवाय कुछ नहीं मिलता।
पहले भी हो चुके है भावुक
-झांसी जिले के SSP रहे अखिलेश कुमार चौरसिया का ट्रांसफर एटा जिले में कर दिया गया था। उनका विदाई कार्यक्रम रखा गया था। इस दौरान सड़क पर भीख मांगने वाले कुछ गरीब बच्चे अखिलेश कुमार को विदाई देने के लिए उनके आवास पर पहुंचे। सभी के हाथ में गुलाब का फूल था। SSP ने भी बच्चों को निराश नहीं किया।
-उन्होंने फूल लेकर बच्चों का हालचाल पूछा। इस बीच एक बच्ची की बात सुनकर वह भावुक हो गए और तुरंत एक्शन लेने का आदेश दिया। सभी बच्चों ने उनका धन्यवाद किया, लेकिन एक बच्ची बोली, \’\’सर…मेरी मां मुझे गलत काम कराना चाहती है।\’\’
-एसएसपी ने बच्ची से उसका नाम पूछा और बोले- तुम्हारी मां ऐसा क्यों करती है? बच्ची बोली- मां रोज शराब पीती है और मेरे पापा को मारती है। मुझे स्कूल जाने से रोकती है। अखिलेश चौरसिया ने तुरंत कार्रवाई करने के आदेश दिए थे।