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Success Story of IAS Topper Navneet Mann: Navneet Mann is one of those candidates who initially did not intend to pursue a career in civil services. She decided to take the UPSC exam in her final year of graduation and succeeded on her first attempt. However, she was not satisfied with her rank and the position she received, so she took the exam again while still in training. On her second attempt, Navneet achieved satisfactory success, securing the 33rd rank in the UPSC CSE exam. In an interview with Delhi Knowledge Track, Navneet shared key points of her strategy. Let’s explore them in detail.

Engineer Navneet: Navneet’s father is an inspector in the Delhi Police. Despite not having any family members in public service, Navneet decided to pursue engineering after the twelfth grade. He was selected and completed his graduation in computer engineering in Delhi. Originally from Amritsar, Punjab, Navneet’s education took place in Delhi due to his father’s job. Inspired by his father, Navneet turned his focus toward civil service. After a few months of contemplation, he decided to take the UPSC CSE exam and began preparing in his third year of graduation.

Selected in the first attempt – After completing graduation, Navneet prepared for a year and made her first attempt in 2018. She was selected in the first attempt and secured a rank of 501. With this rank, Navneet was allotted the Defense Account Service. Although she joined, she was not happy because she wanted to become an IAS. While on training, Navneet made a second attempt and achieved the desired rank and position in the 2019 exam. Navneet considers her father as a source of inspiration, who not only motivated her to enter this field but also kept motivating her from time to time.

Source Limited – Navneet says that it is especially important for candidates to keep their sources limited for preparing for the mains examination. Do not gather so many books that you cannot revise. Read fewer books repeatedly, to the extent that when asked to write an answer in the exam, you do not face any trouble thinking, framing, and writing the answer within a limited time. She says that during the main exam, there is so little time that if you spend a lot of time thinking, you will not have time left to write.

Navneet further says that while it is necessary to keep limited books, there are also some subjects whose books are not available even after searching. For this, you will have to rely on the UPSC syllabus. Keep it in front of you and see which keywords UPSC has used for it. By using them, you can search for these topics on the internet. Along with this, information about them can also be found from toppers’ copies, videos, etc. Do not waste time searching for books for them. If you want, you can also take some notes from the coaching. Prepare notes according to the syllabus.

Go for time-tested environment tests – Navneet says that giving test series is not only necessary for practice, but also teaches you to write your point within time. She says that if you are preparing on a topic from five or six sources and the same question comes, then you need to jot down all those sources in one place, and that too within time and under exam pressure. Here, test series helps you. You learn to write better answers within the time limit under the same pressure. Another important thing Navneet believes in is notes. She says that revising with notes is easy. She also acknowledges that her mistake in the first attempt was not revising in the end. Therefore, make sure to make notes and keep them concise so that you can revise easily. Revision is very important to succeed in this exam.

IAS Isha Duhan: तेज–तर्रार IAS अफसरों में होती है गिनती
हम बात कर रहें है महिला आईएएस ईशा दुहां (Isha Duhan) की, जो अभी हाल ही में यूपी के चंदौली जिले की की नई डीएम बनी है। ईशा दुहन की गिनती तेज-तर्रार आईएएस अधिकारियों में होती है। ईशा 2014 बैच की IAS Officer के रूप में बतौर डीएम पहली पोस्टिंग है। इससे पहले वह असिस्टेंट मजिस्ट्रेट के रूप में मेरठ, मुख्य विकास अधिकारी के पद पर बुलंदशहर और मेरठ में काम कर चुकी हैं और वर्तमान में वाराणसी में वाराणसी विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद पर कार्य कर रही थी। ईशा की गिनती तेज–तर्रार आईएएस अफसरों में की जाती है तथा उन्हे कड़ी फैसले लेने के लिए जाना जाता है। अभी हाल ही में हुए तबादलों में ईशा दुहन (IAS Isha Duhan) को चंदौली की कमान सौंपी गयी है
हरियाणा की रहने वाली हैं IAS Isha Duhan
हरियाणा के पंचकुला की रहने वाली ईशा दुहन ने पटियाला से बी टेक बायोटेक्नोलॉजी करने के बाद सिविल सर्विसेज़ के क्षेत्र में जाने का निश्चय किया और पहले ही प्रयास में 59वीं रैंक हासिल किया। वाराणसी में लेडी सिंघम के नाम से मशहूर ईशा दुहन का नाम भू माफियाओं के लिए बुरे सपने से कम नहीं था

भू माफियाओं से अकेले लिया था लोहा

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बतौर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट वाराणसी के राजातालाब की SDM रहने के दौरान सरकारी तामझाम से दूर IAS Isha Duhan 2017 में अकेले ही खनन माफियाओं से लोहा लेने निकल पड़ी थी। ग्रामीणों की मदद से उन्हें पकड़ भी लिया। इसके अलावा राजातलाब तहसील में एसडीएम पद के दौरान एक व्यक्ति द्वारा पान खाकर उनके कक्ष में घुसना उसे भारी पड़ गया था। आईएएस ईशा दुहन ने उसे फटकारते हुए उसपर 500 रुपये का जुर्माना भी लगाया था।

IAS ईशा दुहन का 17 अप्रैल 2018 को बनारस से तबदला हुआ था। उन्हें बुलंदशहर का सीडीओ बनाया गया था। ईशा दुहन ना सिर्फ एक तेज-तर्रार IASअफसर हैं, बल्कि वाराणसी जिला प्रशासन की ये युवा सदस्य भविष्य की काशी के निर्माण संबंधी योजनाओं में अहम भूमिका निभा चुकी हैं।
वीडीए उपाध्यक्ष रहने के दौरान कई अवैध निर्माणों पर बुल्डोजर चलवा चुकी हैं। दबंग लेडी IAS अफसर ईशा दुहन की जनता में छवि जनप्रिय अधिकारी के रूप में है। ईशा दुहन अपने पिता से काफी प्रभावित रहीं हैं। इनके पिता ईश्वर दुहन आईटीबीपी में डीआईजी रह चुके हैं।

पुरुष प्रधान दुनिया में अगर हर महत्वपूर्ण पद पर महिला बैठी हो तो आप क्या कहेंगे? ऐसा हुआ है कानपुर देहात जिले में। यहां इस समय ज्यादातर महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी महिलाएं संभाल रही हैं। डीएम नेहा जैन, एसपी सुनीति, सीडीओ सौम्या पांडेय, कई एसडीएम, बीएसए और जिला पंचायती राज अधिकारी भी महिला हैं। ‘ऑल विमिन टीम’ की सदस्य एसपी सुनीति कहती हैं, किसी महत्वपूर्ण पद पर महिला अधिकारी के होने से समन्वय बढ़िया होता है। कोशिश रहती है कि अच्छा कर पाएं।
बात समझाना होता आसान:
कुछ साल पहले डीएम, एसपी और सीडीओ के पद पर महिलाओं की तैनाती के बाद उन्नाव जिला चर्चा में आया था। बीते दिनों एसपी के पद पर आईपीएस अधिकारी सुनीति की तैनाती के बाद जानकारों की नजर कानपुर देहात जिले पर गईं। अब ज्यादातर महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं हैं। बातचीत में पुलिस-प्रशासन से जुड़ी सारी महिला अधिकारी इस बात पर खुशी जताती हैं। हर अधिकारी का कहना है कि दूसरे किसी पद पर महिला अधिकारी के होने से अपनी बात कहना और समझाना काफी आसान हो जाता है।

अच्छा है समन्वय:
एसपी सुनीति कहती हैं कि मेरी इस बारे में डीएम नेहा जैन से चर्चा भी हुई है। हम चाहते हैं कि चीजें और बेहतर हों। जिले के लिए कुछ अच्छा कर पाना जरूरी है। लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। हर चुनौती जीवन का अंग है। वह कहती हैं, जब औरैया में एसपी थी तो बेटा 8 महीने का था। इस वक्त बेटी 9 महीने की है। मैं जिले के साथ परिवार को भी मैनेज कर लूंगी। परिवार के सहयोग से सब कर पा रही हूं।
काम करने में आसानी:
सीडीओ सौम्य पांडेय भी इसे एक अवसर की तरह देखती हैं, वह कहती हैं, महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। मैं भाग्यशाली हूं कि इस टीम का हिस्सा हूं। महिलाओं के लिए बनाए आगे बढ़ रही हैं। मैं भाग्यशाली हूं कि इस टीम का हिस्सा हूं। महिलाओं के लिए बनाए
यूपीसीडा में थी अपर कार्यपालक पद पर तैनात
कानपुर देहात की नवागत जिलाधिकारी बनीं 2014 बैच की आईएएस नेहा जैन यूपीसीडा में अपर कार्यपालक पद पर तैनात थीं। पूर्व में ट्रेनिंग के दौरान वह आगरा तैनात रही हैं। इसके बाद उन्होंने लखनऊ में एसडीएम व फिरोजाबाद में मुख्य विकास अधिकारी के तौर पर जिम्मेदारी संभाली। उनके साथ काम करने वाले लोगों ने बताया कि वह अपने काम के प्रति बेहद ईमानदार है और हर काम समय पर करने कि उनकी आदत है।
कानपुर से है गहरा नाता
कानपुर देहात की नवागत जिलाधिकारी बनी नेहा जैन का कानपुर से बहुत गहरा नाता है। कानपुर में उनकी पूरी स्कूलिंग हुई है। उनके माता-पिता कानपुर में ही रहते हैं। उनके पिता आर.सी गोयल वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं।उनका स्वभाव मिलनसार एवं मृदुभाषी है। वह बेहद ईमानदार व सरल स्वभाव की हैं।
]]>सेबी ने कहा कि वह बाजार के सुचारू संचालन के लिए जिम्मेदार संस्था होने के नाते बाजार को व्यवस्थित और कुशल कामकाज को बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है। एक विशेष समूह के शेयरों में चल रही अत्यधिक अस्थिरता को दूर करने के लिए पहले से परिभाषित और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध निगरानी उपायों (एएसएम ढांचे सहित) को लागू कर रहा है। किसी भी स्टॉक की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की कुछ शर्तों के तहत यह तंत्र ऑटोमेटिक रूप से लागू हो जाता है।
स्टॉक एक्सचेंज बीएसई और एनएसई ने अडानी समूह की तीन कंपनियों – अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन और अंबुजा सीमेंट्स को अपने अल्पकालिक अतिरिक्त निगरानी उपाय (एएसएम) के तहत रखा है।
सेबी का यह बयान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस बयान के घंटों के भीतर आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘अडानी एंटरप्राइजेज पर यूएस-आधारित लघु विक्रेता हिंडनबर्ग के “स्टॉक हेरफेर” आरोपों के बाद 20,000 करोड़ रुपये के फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (एफपीओ) को रद्द करने के बाद भारत की मैक्रो फंडामेंटल और छवि प्रभावित नहीं हुई है। देश की की मजबूत धारणा बरकरार बनी हुई है।
वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि अडानी के मुद्दे पर नियामक अपना काम करेंगे और उनके पास बाजारों की स्थिरता सुनिश्चित करने के साधन हैं। सीतारमण ने कहा कि नियामक सरकार से स्वतंत्र हैं, और “बाजार को अच्छी तरह से विनियमित करने के लिए जो उचित है उसे करने के लिए उन्हें खुद पर छोड़ दिया गया है। हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट में अडानी समूह की कंपनियों पर हेराफेरी का आरोप लगाया था। हालांकि अडानी ने आरोपों से इनकार किया है। हिंडनबर्ग रिसर्च ने कहा कि अडानी समूह भारत को व्यवस्थित ढंग से लंबे समय से लूट रहा है। हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद अडानी समूह की कंपनियों के शेयर तेजी से गिर गए। अडानी दुनिया के अमीरों की सूची में लुढ़कते हुए 20 टॉप उद्योगपतियों की सूची से भी बाहर हो गए।
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि रिजर्व बैंक और अन्य एजेंसियां अपना काम कर रही हैं। रिजर्व बैंक ने कल शुक्रवार को ही इस बारे में बताया था कि उसने सभी सरकारी बैंकों से सूचनाएं मांगी हैं।
निर्मला सीतारमण ने कहा कि रेगुलेटर अपना काम कर रहे हैं। आरबीआई ने बयान दिया। एलआईसी ने अपने एक्सपोजर (अडानी समूह को) के बारे में बताया। रेगुलेटर आजाद है, जो उचित है उसे करने के लिए सक्षम हैं ताकि बाजार अच्छी तरह से चलता रहे।

अडानी विवाद एक राजनीतिक फ्लैशप्वाइंट में बदल गया है। विपक्ष ने अदालत की निगरानी में जांच या आरोपों की संयुक्त संसदीय समिति की जांच की मांग की है। वित्त मंत्री ने शुक्रवार को कहा था कि भारत का वित्तीय क्षेत्र बहुत अच्छी तरह से विनियमित है और मात्र एक उदाहरण से उसे हिलाया नहीं जा सकता। वित्त सचिव टीवी सोमनाथन ने भी शुक्रवार को कहा था कि व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से यह स्थिति बस “चाय के प्याले में तूफान” की तरह है। शनिवार को, उन्होंने कहा कि वह अपने बयान पर कायम हैं।
हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बाद से अडानी कंपनियों के शेयरों की क़ीमतें धड़ाम गिरी हैं और इससे समूह का मूल्य क़रीब आधा ही रह गया है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद से अब तक क़रीब 120 बिलियन यानी 1.2 ख़रब डॉलर का नुक़सान हुआ है।
हिंडनबर्ग रिसर्च ने उद्योगपति गौतम अडानी की कंपनियों पर स्टॉक में हेरफेर और लेखा धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हमने अपनी रिसर्च में अडानी समूह के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों सहित दर्जनों व्यक्तियों से बात की, हजारों दस्तावेजों की जांच की और इसकी जांच के लिए लगभग आधा दर्जन देशों में जाकर साइट का दौरा किया। हालाँकि अडानी समूह ने उन आरोपों को खारिज कर दिया।
रिपोर्ट आने के बाद अडानी समूह को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। अब भारतीय स्टॉक एक्सचेंज ने अडानी एंटरप्राइजेज सहित अडानी समूह की कम से कम तीन कंपनियों को बीएसई और एनएसई की निगरानी में डाल दिया है।अडानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और झटका लगने जा रहा है। S&P डाउ जोंस ने कहा है कि वह अडानी समूह की प्रमुख फर्म अडानी एंटरप्राइजेज को 7 फरवरी से अपने इंडेक्स से हटा देगा। डाउ जोंस ने तमाम मीडिया विश्लेषण और हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट आने के बाद पहली बार यह घोषणा की है।
]]>वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज बुधवार 1 फरवीर को थोड़ी देर में बजट पेश करने वाली हैं। केंद्रीय बजट 2023 इस साल बहुत मायने रखता है क्योंकि 2024 के आम चुनाव से पहले यह मोदी सरकार का आखिरी बजट है। 2019 के बाद से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पांचवीं बार सालाना बजट पेश कर रही हैं।
वित्त मंत्री निर्मला ने बजट 2023 पेश करने से पहले वित्त मंत्रालय गईं और फिर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से औपचारिक मुलाकात कर बजट के बारे में सारी जानकारी दी। अब बजट को कैबिनेट के सामने पेश किया जाएगा। वहां इसकी मंजूरी ली जाएगी। इसके बाद वो जल्द ही वो संसद में बजट पेश करेंगी।
शेयर बाजार मजबूती के साथ खुला और इसका अर्थ ये है कि बजट को लेकर लोगों का रुख पॉजिटिव है। शेयर बाजार 60000 के करीब पहुंचा।
2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोकस कम टैक्स दर, जबरदस्त श्रम सुधार, सब्सिडी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी सहित अन्य क्षेत्रों पर रहा है। निर्मला सीतारमण ने कल मंगलवार को इस वित्त वर्ष के लिए आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया था। जिसमें कोविड महामारी के बाद भारत में आर्थिक सुधार पूरा होने का दावा किया गया है। आने वाले वित्त वर्ष 2023-24 में अर्थव्यवस्था के 6 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत के दायरे में बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि इस वित्त वर्ष में 7 फीसदी और 2021-22 में 8.7 प्रतिशत की तुलना में यह काफी कम है।
]]>लेकिन नामों को बदलने का एक तर्क होता है, उसके पीछे राजनीतिक और सांस्कृतिक नीयत होती है। बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार जब नाम बदलने की राजनीति करती है तो उसकी भी एक नीयत दिखाई पड़ती है जो चिंताजनक है। वह मूलतः दो तर्कों का हवाला देती है- एक तर्क यह होता है कि गुलामी की स्मृति से मुक्ति पाने की ज़रूरत है और दूसरा तर्क यह होता है कि भारत का जो स्वर्णिम अतीत है, उसकी विरासत को जीवित रखा जाना ज़रूरी है।
लेकिन ये दोनों तर्क इस तथ्य की उपेक्षा करते हैं कि अतीत या स्मृति कोई कटी-छँटी चीज़ नहीं होती जिसे आप किसी पौधे की तरह अपने सांस्कृतिक गमले में सजा लें। उसका एक अविच्छिन्न सिलसिला होता है जिसमें बरसों नहीं, सदियों की हवा-मिट्टी और पानी का संस्पर्श शामिल होता है। बहुत संभव है कि इस अविच्छिन्नता में बहुत सारे तत्व आपको नापसंद हों या नागवार गुज़रें, लेकिन इतने भर से उनकी हक़ीक़त मिट नहीं जाती। ख़ास कर भारत जैसे देश में, जहाँ पांच हज़ार साल की एक अविच्छिन्न सभ्यता दिखाई पड़ती है, वहां स्मृति और विरासत के नाम पर यह खेल दरअसल इस सभ्यता की स्वाभाविकता को काटने का, उसे कमज़ोर करने का खेल बन जाता है।
जब मुग़ल गार्डन का नाम अमृत उद्यान किया जाता है, या जब इलाहाबाद को प्रयागराज बनाया जाता है या फिर जब मुग़लसराय को दीनदयाल उपाध्याय नगर में बदला जाता है तो ऐसे प्रयत्नों की अस्वाभाविकता बहुत साफ़ दिखाई पड़ती है। इलाहाबाद का प्रयागराज से कोई बैर नहीं है। दोनों साथ-साथ हम सबकी स्मृति में जीवित हैं। ऐसी साझा स्मृति का दूसरा उदाहरण बनारस और काशी हैं। लेकिन जब आप इलाहाबाद को मिटा कर प्रयागराज को स्थापित करना चाहते हैं तो दरअसल, आप स्मृति के एक हिस्से को- जो कम से कम एक हज़ार बरस का है- काट कर- उस संस्कृति का वर्चस्व बनाना चाहते हैं जो दरअसल फ़िलहाल कहीं अस्तित्व में नहीं है। इसके बाद इलाहाबाद पूछता है कि वह अपने अमरूदों का क्या करे, अपने उस विश्वविद्यालय को किस नाम से पुकारे जिसे कभी पूरब का ऑक्सफोर्ड कहते थे और अपने शायर अकबर इलाहाबादी को किस नए नाम से जाने, जिन्होंने अपनी शायरी में अंग्रेज़ियत और आधुनिकता दोनों की जम कर ख़बर ली थी।
ठीक है कि मुग़ल गार्डन के पास ऐसे सवाल नहीं होंगे। उसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं है। लेकिन मुग़ल गार्डन बोलते ही जो स्मृति सिर उठाती है, क्या अमृत उद्यान नाम से वैसी कोई स्मृति है?
ठीक है कि मुग़ल गार्डन के पास ऐसे सवाल नहीं होंगे। उसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं है। लेकिन मुग़ल गार्डन बोलते ही जो स्मृति सिर उठाती है, क्या अमृत उद्यान नाम से वैसी कोई स्मृति है?
अमृत उद्यान नाम दरअसल यह संदेह पैदा करता है कि सांस्कृतिक शुद्धतावाद की जिस अधकचरी अवधारणा को बीजेपी अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल की तरह स्थापित करने में लगी है, उसके तहत उसने एक तत्सम शब्द-युग्म के सहारे यह नाम चुन लिया है।
मगर यह संदेह फिर भी छोटा है। ज़्यादा बड़ा संदेह यह है कि दरअसल बीजेपी और संघ परिवार को पूरे मध्यकाल से समस्या है। इस मध्यकाल में संस्कृत नहीं बोली जाती, कबीर पंडितों और मुल्लों का मज़ाक बनाते हैं, मीरा प्रेम के नाम पर बग़ावत करती नज़र आती हैं, रसख़ान और जायसी कृष्णकथा कहते मिलते हैं और कुंभनदास और रैदास जैसे कवि अपने स्वाभिमान को अपना मूल्य बनाते हैं। इसी मध्यकाल में नानक मिलते हैं जो एक नया पंथ शुरू कर डालते हैं। इस मध्यकाल में ताजमहल, लाल क़िला और जामा मस्जिद जैसी शानदार इमारतें बनती हैं, अमीर खुसरो से लेकर तानसेन तक आते हैं। गांधी इसी मध्यकाल से प्रेरणा ग्रहण करते हैं, अपने भजनों की किताब में मध्यकाल का साहित्य भर डालते हैं और ख़ुद को जुलाहा बताते हैं।
बेशक, इस मध्यकाल में एक बड़ी सांस्कृतिक उपस्थिति तुलसीदास की भी है। कुल मिलाकर यह मध्यकाल एक बड़े सांस्कृतिक प्रतिरोध और उद्वेलन का काल भी है जो किसी काल्पनिक स्वर्णकाल से ज़्यादा ठोस, ज़्यादा निरंतर और हमारी आधुनिकता के ज़्यादा क़रीब है। मगर बीजेपी की शब्दावली में यह पूरा दौर ग़ुलामी का दौर है जिससे निजात पाने की ज़रूरत है।
बीजेपी की सारी समस्या यही है। उसे अपने सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए वह काल्पनिक रामराज्य चाहिए, जहां लोग संस्कृत बोलने वाले हों, मुग़ल गार्डन में नहीं, अमृत उद्यान में घूमते हों और पूजा-पाठ और यज्ञ से राक्षसों और दुष्टों को मार भगाने की विधियाँ विकसित करते हों।
लेकिन इतिहास के ठोस तथ्य बीजेपी की इस कल्पनाशीलता का साथ नहीं देते। उसे समझ में आता है कि इसके लिए उसे अपना इतिहास और अपना मध्यकाल गढ़ना होगा। इसलिए वह अतीत में जाकर नए नायकों की खोज करती है, राणा प्रताप या शिवाजी को हिंदुत्व के उद्धारकों की तरह प्रस्तुत करती है और बाबर-अकबर से लेकर औरंगजेब और बहादुरशाह ज़फ़र तक को ख़ारिज करने की कोशिश करती है। यह मुग़लिया इतिहास उसे ख़ास तौर पर परेशान करता है। इसलिए वह मुग़लसराय का नाम दीनदयाल उपाध्याय नगर रखते हुए एक अजब सी दलील देती है- कि इसी शहर के रेलवे प्लैटफॉर्म पर दीनदयाल उपाध्याय का शव मिला था। निश्चय ही यह दुखद था, उनका ऐसा अंत नहीं होना चाहिए था, लेकिन बस इस आधार पर एक शहर का नाम बदल देना कितना उचित है? उनकी स्मृति अक्षुण्ण रखने के लिए उनकी मूर्ति लगाई जा सकती थी, उनके नाम पर कुछ संस्थान बनाए जा सकते थे, लेकिन एक पूरे शहर से उसका नाम छीन लेना कितना जायज़ है?
मुग़ल गार्डन का नाम परिवर्तन भी इसीलिए परेशान करता है। वह सांस्कृतिक आरोपण की एक बड़ी प्रक्रिया का छोटा सा हिस्सा है। लेकिन इस सांस्कृतिक आरोपण से हम क्यों परेशान हैं? क्योंकि बीजेपी यह जो नया सांस्कृतिक उद्यान बना रही है, उसमें बहुत सारे हिंदुस्तानियों के लिए जगह नहीं दिखती या दोयम दर्जे की जगह दिखती है। इस देश के दलित, आदिवासी, पिछड़े या अल्पसंख्यक इस सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के आगे या तो ख़ुद को असहाय पा रहे हैं या फिर छोटी-छोटी लड़ाइयाँ लड़ रहे हैं- उनके सामने उनके वजूद और गुज़ारे का संकट बड़ा होता जा रहा है।
मुग़ल गार्डन कोई जनता की चीज़ नहीं है। वह राष्ट्रपति भवन का हिस्सा है जिसे साल में एक बार आम लोगों की सैर के लिए खोला जाता है। लेकिन उसकी जगह जो अमृत उद्यान आ गया है, उसका नाम ही बहुत सारे लोगों को इसमें प्रवेश के लिए सांस्कृतिक तौर पर अनधिकृत या अवांछित बना डालता है। वैसे, एक सच यह भी है कि सरकारी नाम बदल जाने से जगहों के प्रचलित नाम आसानी से ख़त्म नहीं हो जाते। समय भी उन्हें एक मान्यता देता है। कनॉट प्लेस को राजीव चौक मिटा नहीं पाया, चांदनी चौक का कोई और नाम उसे बदल नहीं पाएगा, इलाहाबाद प्रयागराज के साथ बचा रहेगा और अमृत उद्यान के अलावा लोगों को मुग़ल गार्डन भी याद आता रहेगा। मगर सांस्कृतिक आरोपण के इस प्रयत्न के प्रतिरोध में इतनी भर तसल्ली पर्याप्त नहीं है, उसके व्यापक निहितार्थ समझने और उसकी काट खोजने की ज़रूरत है।
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हिंडनबर्ग ने अपने ट्विटर हैंडल पर सोमवार को जारी बयान में कहा –

हिंडनबर्ग ने कहा, अडानी के ‘413 पेज’ के जवाब में हमारी रिपोर्ट से संबंधित मुद्दों पर केंद्रित कुल 30 पेज ही थे।…हमने नोट किया है कि हमारी रिपोर्ट के मुख्य आरोपों में फर्जी कंपनियों के साथ कई संदिग्ध लेन-देन पर केंद्रित थी – उन सवालों के जवाब पूरी तरह से अनसुलझे रह गए हैं।
अडानी के लिए आज सोमवार 30 जनवरी का दिन खास है। अडानी ग्रुप की प्रमुख कंपनी को $2.5 बिलियन शेयर बिक्री के साथ एक महत्वपूर्ण दिन का सामना करना पड़ेगा। भारतीय अरबपति के शेयरों में $48 बिलियन की गिरावट आई है, जो यू.एस. शॉर्ट सेलर की रिपोर्ट से शुरू हुई थी।
स्कूल ड्रॉपआउट अडानी के लिए स्टॉक मार्केट मंदी एक नाटकीय झटके के अलावा कुछ नहीं है। अडानी पिछले सप्ताह फोर्ब्स की सूची में सातवें स्थान पर फिसलने से पहले, हाल के वर्षों में दुनिया के तीसरे सबसे अमीर आदमी में शुमार किए गए थे। हाल के अपने दो इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मोदी जी जब गुजरात के सीएम थे तो उस समय कारोबार खूब फला-फूला। सभी उद्योगों को लाभ मिला, जिसमें अडानी समूह भी था। उन्होंने मोदी से अपने रिश्तों के सवाल पर यह बात कही थी। यानी उनका कहना था कि पीएम मोदी ने उनको कोई अलग से लाभ नहीं पहुंचाया।
अमेरिका की जानी-मानी निवेश शोध फर्म हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी समूह पर स्टॉक बाज़ार में हेरफेर करने का सनसनीखेज आरोप लगाया था। इसने कहा कि अडानी समूह एक स्टॉक में खुलेआम हेरफेर करने और अकाउंट की धोखाधड़ी में शामिल था। हिंडनबर्ग रिसर्च के इस आरोप पर अडानी समूह ने कहा है कि दुर्भावनापूर्ण, निराधार, एकतरफा और उनके शेयर बिक्री को बर्बाद करने के इरादे ऐसा आरोप लगाया गया है। इसने कहा है कि अडानी समूह आईपीओ की तरह ही फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफ़र यानी एफ़पीओ ला रहा है और इस वजह से एक साज़िश के तहत कंपनी को बदनाम किया जा रहा है।
अमेरिकी फर्म की रिपोर्ट आने के साथ ही अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों के दाम तेज़ी से गिरे। अडानी ट्रांसमिशन के शेयर की क़ीमत में पिछले हफ्ते 8.87 फ़ीसदी की गिरावट आई थी। इसी तरह से अडानी पोर्ट्स, अडानी गैस, अडानी विल्मर, अडानी पावर सहित पूरे समूह की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट रही।
हिंडनबर्ग अमेरिका आधारित निवेश रिसर्च फर्म है जो एक्टिविस्ट शॉर्ट-सेलिंग में एकस्पर्ट है। रिसर्च फर्म ने कहा कि उसकी दो साल की जांच में पता चला है कि “अडानी समूह दशकों से 17.8 ट्रिलियन (218 बिलियन अमेरिकी डॉलर) के स्टॉक के हेरफेर और अकाउंटिंग की धोखाधड़ी में शामिल था।
यह रिपोर्ट अडानी समूह के प्रमुख अडानी एंटरप्राइजेज की 20,000 करोड़ रुपये की फॉलो-ऑन शेयर बिक्री से पहले आई थी। समूह फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (एफपीओ) 27 जनवरी से शुरू होगा और 31 जनवरी को बंद होगा। अडानी समूह ने इस रिपोर्ट के बाहर आने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि इन आरोपों की तथ्यात्मक जांच के लिए समूह से संपर्क किए बिना ही इस रिपोर्ट के बाहर आने से वह हैरान है।
रिसर्च फर्म की रिपोर्ट के मुताबिक अदानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी ने पिछले तीन सालों के दौरान लगभग 120 अरब अमेरिकी डॉलर का लाभ अर्जित किया है जिसमें से अडानी समूह की सात प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के स्टॉक मूल्य की बढ़ोत्तरी से 100 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक कमाये। जिसमें पिछले तीन साल की अवधि में 819 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हुई।
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट कैरेबियाई देशों, मॉरीशस और संयुक्त अरब अमीरात तक फैले टैक्स हैवन देशों में अडानी परिवार के नियंत्रण वाली मुखौटा कंपनियों के नेक्सस का विवरण है। जिसके बारे में दावा किया गया है कि इनका इस्तेमाल भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और करदाताओं की चोरी को सुविधाजनक बनाने के लिए किया जाता है। जबकि धन की हेराफेरी समूह की सूचीबद्ध कंपनियों से की गई थी।
]]>पांच महीने तक चली इस यात्रा को वैसे तो गैर राजनीतिक यात्रा कहा जाता रहा है, जो देशभर में बढ़ रही नफरत की सांप्रदायिकता के खिलाफ शांति का संदेश लेकर आगे बढ़ रही थी। लेकिन किसी भी राजनीति दल या नेता द्वारा आयोजित की जानी वाली ऐसी यात्राय़ें हमेशा से राजनीतिक ही रहीं हैं, फिर वो महात्मा गांधी का नमक कानून के विरोध में किया दांड़ी मार्च हो फिर हालिया भारत जोड़ो यात्रा।
भारत एक बनता हुआ राष्ट्र है जिसमें एक समय पर एक साथ कई राष्ट्रीयताएं सासं लेती हैं। जो भारत की मजबूती भी हैं, लेकिन इनको ढंग से न संभाला जाए तो यह चुनौती भी बन सकती हैं। 2014 में भाजपा सरकार आने के बाद से ये मजबूती चुनौतियों के रूप में परिवर्तित होती गई हैं, औऱ ये चुनौती लगातार बढ़ी है। इसमें सांप्रदायिकता से लेकर अलगाववाद तक भाषा विवाद से लेकर बेतहाशा अमीरी और गरीबी का प्रमुख हैं। आज के सममय में इसको सुलझाया जाना बहुत जरूरी है। लेकिन कोई भी नेता जो लगातार चुनावी राजनीति में सक्रिय है, उसके पास नैतिक आधार है कि वह कहे कि वह भारत जोड़ो जैसा कोई उपक्रम कर रहा है, और इन सब मुद्दों को कैसे हल करेगा इसका कोई खाका उसके पास है क्या? क्योंकि इससे पहले जितनी भी यात्रायें रही हैं, उसमें लगे लोग चुनावी राजनीति से इतर के लोग थे। जिनका नैतिक प्रभाव ज्यादा था बजाए राजनीतिक के और उन्होंने एक विकल्प भी दिया। राहुल जिन मुद्दों से लड़ने की बात कर रहे हैं, उनके पास इससे लड़ने के क्या विकल्प हैं यह यात्रा के खत्म हो जाने के बाद भी सामने नहीं आया है।
इस सबसे इतर भारत जोड़ो यात्रा का मुख्य संदेश नफरत के खिलाफ शांति का संदेश फैलाना था, जिसके लिए मोहब्बत की दुकान जैसे जुमले भी प्रयोग किये गये, यहां सवाल यह है कि उनका यह अभियान सफल होगा क्योंकि सांप्रादायिकता इस समाज के लिए नासूर बन गया है। इसको कुछ महीनों की यात्रा या फिर कुछ फोटो वीडियो के जरिए नहीं मिटाया जा सकता। इससे लड़ने के लिए एक मशीनरी चाहिए जोकि कांग्रेस के पास नदारद है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां कांग्रेस का बड़ा आधार रहा है वहां उसके पास उसके खुद के कैडर का एक नेता भी नहीं है जिसे पार्टी अध्यक्ष बना सके। ऐसे में सबसे निचले स्तर पर कितने लोग उनकी इस लड़ाई में साथ आएंगे बड़ा सवाल है।
राहुल की इस यात्रा का अघोषित मकसद उनका छवि निर्माण करना था, जिसके लिए पार्टी ने पूरी कोशिश भी की। इस यात्रा के बहाने राहुल गांधी एक ऐसे नेता के तौर पर उभर कर सामने आए जो कह सकता है कि वह देश की नब्ज को जानता है, दक्षिण से लेकर उत्तर तक। यह उनकी व्यतिकगत छवि के लिए ठीक भी हो सकता है। लेकिन सवाल यह रह जाता है कि राहुल जिन मुद्दों को लेकर आगे चल रहे थे वे उनको लागू करवा पाएंगे? पुराने अनुभव के हिसाब से तो यही कहा जा सकता है कि ऐसा मुश्किल दिखता है, क्योंकि यात्रा से पहले भी राहुल पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे।
राहुल गांधी ने इस पूरी यात्रा के दौरान सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक लगभग हर तरह के मुद्दों पर सरकार को घेरा। इसमें उन्होंने अडानी समूह को मुख्य रूप से निशाना बनाया, नरेंद्र मोदी से करीबी के चलते जिनके कारोबार में पिछले आठ सालों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। यात्रा के समाप्त होने से पहले अमेरिकी रिसर्च फर्म हिंडनबर्ग ने राहुल गांधी के आरोपों को सही साबित भी कर दिया, लेकिन सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी कोई ऐसी वैकल्पिक नीतियों के निर्माण पर जोर देंगे जिससे की इस तरह की मोनोपोली न होने पाए। वर्तमान आर्थिक परिदृश्यों में ये सवाल जरूरी हो जाता है।
पिछले आठ सालों में कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी को अलविदा कहा है। यह कमजोर होती कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती थी कि कैसे अपने लोगों को रोककर रखा जाए? भारत जोड़ो यात्रा ने इन नेताओं पार्टी में जोश भरा है और विश्वास दिलाया है कि पार्टी अगर मेहनत करती है तो उसके नतीजे के तौर पर कुछ बेहतर की उम्मीद कर सकती है। इसको इस तरह से भी देखा जा सकता है कि छोटे स्तर के नेताओं से लेकर बड़े कद वाले नेताओं ने इसको सफल बनाने के लिए जी तोड़ मेहनत की। इसके लिए वह कांग्रेस पार्टी में चल रही जड़ता को खत्म करने के लिहाज से बेहतर संकेत है। अगर ऐसा होता है को पार्टी आगे आने वाले चुनावों में कुछ बेहतर की उम्मीद कर सकती है।
आज यात्रा के समापन पर कहा जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी अभी भी बहुत हद तक गांधी परिवार पर ही निर्भर है। और यह निर्भरता ऐसी है कि अगर कांग्रेस यहां से उठती है तो उसका पूरा श्रेय राहुल को ही जाएगा। लेकिन केवल एक यात्रा से न तो उनको कोई लाभ होगा और न देश को। पूंजीवाद और फासीवाद के मिले जुले खेल में मध्यमार्ग का रास्ता बहुत कठिन है। लेकिन राहुल गांधी अगर देश के मूल चरित्र मध्यमार्ग की तरफ लाने में थोड़ा सा भी सफल होते हैं तो यह उनकी सफलता मानी जाएगी।
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