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IAS Swati Meena hails from the Sikar district of Rajasthan. She is an officer of the 2008 batch in the Madhya Pradesh cadre. In the year 2007, at the young age of just 22, she cleared the UPSC exam in her first attempt. That year, she secured the 260th rank in the whole of India. She became the youngest IAS officer in her batch. The central government has recently appointed IAS Swati as the new head of the Drinking Water and Sanitation Department. This department falls under the Ministry of Drinking Water and Sanitation.

Swati previously served as the Secretary in the Women and Child Development Department of the Madhya Pradesh government. She is known for her dedication and hard work. Her mother, Dr. Saroj Meena, used to run a petrol pump, and her father later became an officer in the Rajasthan Administrative Service (RAS). She completed her schooling in Ajmer and pursued a diploma from Ajmer’s Sophia Girls College. Her younger sister is an officer in the 2011 batch of the Indian Foreign Service (IFS).

In an interview, Swati mentioned that her mother always wanted her to become a doctor. However, when Swati was in the eighth grade, her aunt got married and she started working as an officer. Seeing this, Swati also decided to become an officer. During her UPSC preparation, Swati received full support from her father. Today, Swati is a well-known IAS officer in the country.


Bureaucrats Magazine – Breaking News –टीना डाबी ने दिल्ली के जीसस एंड मैरी स्कूल से पढ़ाई की है. उन्होंने 12वीं बोर्ड परीक्षा में पॉलिटिकल साइंस औऱ हिस्ट्री में पूरे 100 फीसदी अंक हासिल किए थे. इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में एडमिशन लिया. यहां से उन्होंने पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया है.

Bureaucrats Magazine – Breaking News –गौरतलब है कि लेडी श्रीराम कॉलेज देश का जाना-माना कॉलेज है और दिल्ली विश्वविद्यालय के इस कॉलेज में एडमिशन के लिए कॉम्पटीशन भी काफ़ी अधिक रहता है. यह देश के टॉप कॉलेजों में शामिल है. एनआईआरएफ रैंकिंग 2023 में कॉलेजों की लिस्ट में इसे देशभर में 9वां स्थान दिया गया है.

Bureaucrats Magazine – Breaking News –बता दें कि लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वूमेन में दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्य कॉलेजों की तरह ही सीयूईटी यूजी के आधार पर एडमिशन दिया जाता है. इसमें एडमिशन लेने के लिए आपको सीयूईटी आवेदन पत्र में इसके कोर्स का चयन करना होगा और संबंधित विषयों की परीक्षा में शामिल होना होगा. सीयूईटी स्कोर के आधार पर आप काउंसिलिंग प्रक्रिया में शामिल होकर इसमें एडमिशन ले सकेंगे.
#BureaucratsMag- लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वूमेन की ख़ास बात यह है कि इसकी शिक्षा व्यवस्था बेहतरीन होने के बावजूद यहां की फीस काफी कम है. ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर तबके से आने वाली महिलाएं भी इसमें एडमिशन ले सकती हैं. यहां की फ़ीस की बात करें तो लेडी श्रीराम कॉलेज में 45,000 रुपये से लेकर 1.60 लाख रुपये तक की फीस में सभी यूजी, पीजी एवं सर्टिफिकेट कोर्स किए जा सकते हैं. इस कॉलेज में बीए, बीएससी समेत कई प्रमुख यूजी पीजी कोर्स संचालित किए जाते हैं.
]]>IAS Isha Duhan: तेज–तर्रार IAS अफसरों में होती है गिनती
हम बात कर रहें है महिला आईएएस ईशा दुहां (Isha Duhan) की, जो अभी हाल ही में यूपी के चंदौली जिले की की नई डीएम बनी है। ईशा दुहन की गिनती तेज-तर्रार आईएएस अधिकारियों में होती है। ईशा 2014 बैच की IAS Officer के रूप में बतौर डीएम पहली पोस्टिंग है। इससे पहले वह असिस्टेंट मजिस्ट्रेट के रूप में मेरठ, मुख्य विकास अधिकारी के पद पर बुलंदशहर और मेरठ में काम कर चुकी हैं और वर्तमान में वाराणसी में वाराणसी विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद पर कार्य कर रही थी। ईशा की गिनती तेज–तर्रार आईएएस अफसरों में की जाती है तथा उन्हे कड़ी फैसले लेने के लिए जाना जाता है। अभी हाल ही में हुए तबादलों में ईशा दुहन (IAS Isha Duhan) को चंदौली की कमान सौंपी गयी है
हरियाणा की रहने वाली हैं IAS Isha Duhan
हरियाणा के पंचकुला की रहने वाली ईशा दुहन ने पटियाला से बी टेक बायोटेक्नोलॉजी करने के बाद सिविल सर्विसेज़ के क्षेत्र में जाने का निश्चय किया और पहले ही प्रयास में 59वीं रैंक हासिल किया। वाराणसी में लेडी सिंघम के नाम से मशहूर ईशा दुहन का नाम भू माफियाओं के लिए बुरे सपने से कम नहीं था

भू माफियाओं से अकेले लिया था लोहा

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बतौर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट वाराणसी के राजातालाब की SDM रहने के दौरान सरकारी तामझाम से दूर IAS Isha Duhan 2017 में अकेले ही खनन माफियाओं से लोहा लेने निकल पड़ी थी। ग्रामीणों की मदद से उन्हें पकड़ भी लिया। इसके अलावा राजातलाब तहसील में एसडीएम पद के दौरान एक व्यक्ति द्वारा पान खाकर उनके कक्ष में घुसना उसे भारी पड़ गया था। आईएएस ईशा दुहन ने उसे फटकारते हुए उसपर 500 रुपये का जुर्माना भी लगाया था।

IAS ईशा दुहन का 17 अप्रैल 2018 को बनारस से तबदला हुआ था। उन्हें बुलंदशहर का सीडीओ बनाया गया था। ईशा दुहन ना सिर्फ एक तेज-तर्रार IASअफसर हैं, बल्कि वाराणसी जिला प्रशासन की ये युवा सदस्य भविष्य की काशी के निर्माण संबंधी योजनाओं में अहम भूमिका निभा चुकी हैं।
वीडीए उपाध्यक्ष रहने के दौरान कई अवैध निर्माणों पर बुल्डोजर चलवा चुकी हैं। दबंग लेडी IAS अफसर ईशा दुहन की जनता में छवि जनप्रिय अधिकारी के रूप में है। ईशा दुहन अपने पिता से काफी प्रभावित रहीं हैं। इनके पिता ईश्वर दुहन आईटीबीपी में डीआईजी रह चुके हैं।

हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बाद सरकार घिरी हुई है। विपक्ष लगातार जांच की मांग कर रहा है। कांग्रेस इस मुद्दे पर लगातार मुखर है। उसकी मांग है कि अडानी समूह पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में लगाए गये आरोपों पर संसदीय जांच कमेटी से जांच कराई जाए। बजट सत्र में इसको लेकर खूब हंगामा हुआ लेकिन सरकार ने अभी तक इस मांग को नहीं माना है।
इस सबसे इतर सुप्रीम कोर्ट में जांच के आदेश देने के लिए याचिकाएं दायर की गई हैं। अलग-अलग संस्थांये भी अडानी समूह की तमाम मसलों पर जांच कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को एक जांच समिति के गठन का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्र सरकार द्वारा गठित की जाने वाली जांच समिति कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि केंद्र सरकार की शर्तों पर बनी कोई जांच समिति शायद ही ईमानदारी से मुद्दे की जांज करे। जांच करने की बजाये यह जांच को भटका सकती है। इसका कारण अडाना और मोदी के निजि संबंध हैं। ऐसे में निस्पक्ष जांच की उम्मीद बेमानी है।
उन्होंने कहा कि जो आरोप लगाए गये हैं, वह सत्ता, भारत सरकार और अडानी समूह के बीच आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में सरकार द्वारा प्रस्तावित शर्तों के साथ बनी जांच समिति से स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की उम्मीद बहुत कम है।
सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को हिंडनबर्ग-अडाणी मामले की जांच के लिए विशेषज्ञ स्तर की समिति के गठन के सुझाव को स्वीकार किया था, इस जांज समिति के गठन पर केंद्र सरकार की भी सहमति थी। सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया था कि वह जल्द ही समिति के लिए विशेषज्ञों के नाम सुझाएगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की तरफ से कहा था कि हम सीलबंद लिफाफे में समिति में शामिल किए जाने वाले विशेषज्ञों के नाम सुझाएंगे। याचिकाकर्ताओं द्वारा इन नामों पर चर्चा और विरोध नहीं किया जाना चाहिए। “सुप्रीम कोर्ट सूची में से जांच दल के सदस्यों के नाम चुन सकता है।
रमेश ने समाचार रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि मेहता का सीलबंद लिफाफे में नाम देने का सुझाव इस बात को पुख्ता करता है कि प्रस्तावित समिति सरकार और अडानी समूह के संबंधों की वास्तविक जांच को रोकने के लिए पूर्व योजना का हिस्सा है।
उन्होंने 2001 में शेयर बाजार घोटाले सहित कई औऱ महत्वपूर्ण मामलों की जांच में जेपीसी की भूमिका को याद करते हुए कहा कि इन समितियों की रिपोर्टों ने बहुत सारी गलत प्रथाओं को रोकने में सहायता दी। अगर सरकार और प्रधानममंत्री को जवाबदेह बनाया जाए तो जेपीसी के गठन के अलावा और कोई भी जांच समिति लीपापोती के अलावा और कुछ नहीं है।
जयराम रमेश ने जांच समिति के गठन और उसमें सरकार की भूमिका पर अविश्वास जताते हुए सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है। उनकी बात एक हद तक सही भी है कि जब किसी गंभीर मामले की जांज करने के लिए संसदीय व्यवस्था में ही प्रावधान किए गये हैं तब सरकार उन समितियों से जांच कराने से भाग क्यों रही है। जबकि ऐसा पहली बार नहीं है कि इस तरह की मांग उठी हो।
लगभग हर सरकार के सामने कोई ऐसी स्थिति आती है जब उसे इस तरह के हमलों का सामना करना पड़ता है। खुद भाजपा जब विपक्ष में थी उसने न जाने कितनी बार कांग्रेस सरकार को घेरने के लिए जेपीसी से जांच की मांग को उठाया। और सरकार ने भी विपक्ष की बात मानते हुए इसका गठन किया। समिति की रिपोर्टों के बाद कई मंत्रियों को इस्तीफे तक देने पड़े। मोदी की अगुवाई वाली भाजपा में सरकार किसी का इस्तीफा तो छोड़िए, जांच समिति का गठन हो जाए यही बहुत बड़ी बात है।
लोकतांत्रिक परंपरा में पक्ष विपक्ष एक दूसरे पर हमलावर रहते हैं, यह राजनिती का हिस्सा है लेकिन किसी गंभीर मसले पर एक दूसरे की बात मानकर आगे बढ़ने की परंपराएं भी रही हैं। और सबको साथ लेकर चलना लोकतंत्र का तकाजा भी है। लेकिन विपक्ष द्वारा सरकार पर इस तरह का अविश्वास भी शायद ही कभी दिखाया गया हो।
]]>पुरुष प्रधान दुनिया में अगर हर महत्वपूर्ण पद पर महिला बैठी हो तो आप क्या कहेंगे? ऐसा हुआ है कानपुर देहात जिले में। यहां इस समय ज्यादातर महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी महिलाएं संभाल रही हैं। डीएम नेहा जैन, एसपी सुनीति, सीडीओ सौम्या पांडेय, कई एसडीएम, बीएसए और जिला पंचायती राज अधिकारी भी महिला हैं। ‘ऑल विमिन टीम’ की सदस्य एसपी सुनीति कहती हैं, किसी महत्वपूर्ण पद पर महिला अधिकारी के होने से समन्वय बढ़िया होता है। कोशिश रहती है कि अच्छा कर पाएं।
बात समझाना होता आसान:
कुछ साल पहले डीएम, एसपी और सीडीओ के पद पर महिलाओं की तैनाती के बाद उन्नाव जिला चर्चा में आया था। बीते दिनों एसपी के पद पर आईपीएस अधिकारी सुनीति की तैनाती के बाद जानकारों की नजर कानपुर देहात जिले पर गईं। अब ज्यादातर महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं हैं। बातचीत में पुलिस-प्रशासन से जुड़ी सारी महिला अधिकारी इस बात पर खुशी जताती हैं। हर अधिकारी का कहना है कि दूसरे किसी पद पर महिला अधिकारी के होने से अपनी बात कहना और समझाना काफी आसान हो जाता है।

अच्छा है समन्वय:
एसपी सुनीति कहती हैं कि मेरी इस बारे में डीएम नेहा जैन से चर्चा भी हुई है। हम चाहते हैं कि चीजें और बेहतर हों। जिले के लिए कुछ अच्छा कर पाना जरूरी है। लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। हर चुनौती जीवन का अंग है। वह कहती हैं, जब औरैया में एसपी थी तो बेटा 8 महीने का था। इस वक्त बेटी 9 महीने की है। मैं जिले के साथ परिवार को भी मैनेज कर लूंगी। परिवार के सहयोग से सब कर पा रही हूं।
काम करने में आसानी:
सीडीओ सौम्य पांडेय भी इसे एक अवसर की तरह देखती हैं, वह कहती हैं, महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। मैं भाग्यशाली हूं कि इस टीम का हिस्सा हूं। महिलाओं के लिए बनाए आगे बढ़ रही हैं। मैं भाग्यशाली हूं कि इस टीम का हिस्सा हूं। महिलाओं के लिए बनाए
सेबी ने कहा कि वह बाजार के सुचारू संचालन के लिए जिम्मेदार संस्था होने के नाते बाजार को व्यवस्थित और कुशल कामकाज को बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है। एक विशेष समूह के शेयरों में चल रही अत्यधिक अस्थिरता को दूर करने के लिए पहले से परिभाषित और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध निगरानी उपायों (एएसएम ढांचे सहित) को लागू कर रहा है। किसी भी स्टॉक की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की कुछ शर्तों के तहत यह तंत्र ऑटोमेटिक रूप से लागू हो जाता है।
स्टॉक एक्सचेंज बीएसई और एनएसई ने अडानी समूह की तीन कंपनियों – अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन और अंबुजा सीमेंट्स को अपने अल्पकालिक अतिरिक्त निगरानी उपाय (एएसएम) के तहत रखा है।
सेबी का यह बयान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस बयान के घंटों के भीतर आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘अडानी एंटरप्राइजेज पर यूएस-आधारित लघु विक्रेता हिंडनबर्ग के “स्टॉक हेरफेर” आरोपों के बाद 20,000 करोड़ रुपये के फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (एफपीओ) को रद्द करने के बाद भारत की मैक्रो फंडामेंटल और छवि प्रभावित नहीं हुई है। देश की की मजबूत धारणा बरकरार बनी हुई है।
वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि अडानी के मुद्दे पर नियामक अपना काम करेंगे और उनके पास बाजारों की स्थिरता सुनिश्चित करने के साधन हैं। सीतारमण ने कहा कि नियामक सरकार से स्वतंत्र हैं, और “बाजार को अच्छी तरह से विनियमित करने के लिए जो उचित है उसे करने के लिए उन्हें खुद पर छोड़ दिया गया है। हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट में अडानी समूह की कंपनियों पर हेराफेरी का आरोप लगाया था। हालांकि अडानी ने आरोपों से इनकार किया है। हिंडनबर्ग रिसर्च ने कहा कि अडानी समूह भारत को व्यवस्थित ढंग से लंबे समय से लूट रहा है। हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद अडानी समूह की कंपनियों के शेयर तेजी से गिर गए। अडानी दुनिया के अमीरों की सूची में लुढ़कते हुए 20 टॉप उद्योगपतियों की सूची से भी बाहर हो गए।
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि रिजर्व बैंक और अन्य एजेंसियां अपना काम कर रही हैं। रिजर्व बैंक ने कल शुक्रवार को ही इस बारे में बताया था कि उसने सभी सरकारी बैंकों से सूचनाएं मांगी हैं।
निर्मला सीतारमण ने कहा कि रेगुलेटर अपना काम कर रहे हैं। आरबीआई ने बयान दिया। एलआईसी ने अपने एक्सपोजर (अडानी समूह को) के बारे में बताया। रेगुलेटर आजाद है, जो उचित है उसे करने के लिए सक्षम हैं ताकि बाजार अच्छी तरह से चलता रहे।

अडानी विवाद एक राजनीतिक फ्लैशप्वाइंट में बदल गया है। विपक्ष ने अदालत की निगरानी में जांच या आरोपों की संयुक्त संसदीय समिति की जांच की मांग की है। वित्त मंत्री ने शुक्रवार को कहा था कि भारत का वित्तीय क्षेत्र बहुत अच्छी तरह से विनियमित है और मात्र एक उदाहरण से उसे हिलाया नहीं जा सकता। वित्त सचिव टीवी सोमनाथन ने भी शुक्रवार को कहा था कि व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से यह स्थिति बस “चाय के प्याले में तूफान” की तरह है। शनिवार को, उन्होंने कहा कि वह अपने बयान पर कायम हैं।
हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बाद से अडानी कंपनियों के शेयरों की क़ीमतें धड़ाम गिरी हैं और इससे समूह का मूल्य क़रीब आधा ही रह गया है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद से अब तक क़रीब 120 बिलियन यानी 1.2 ख़रब डॉलर का नुक़सान हुआ है।
हिंडनबर्ग रिसर्च ने उद्योगपति गौतम अडानी की कंपनियों पर स्टॉक में हेरफेर और लेखा धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हमने अपनी रिसर्च में अडानी समूह के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों सहित दर्जनों व्यक्तियों से बात की, हजारों दस्तावेजों की जांच की और इसकी जांच के लिए लगभग आधा दर्जन देशों में जाकर साइट का दौरा किया। हालाँकि अडानी समूह ने उन आरोपों को खारिज कर दिया।
रिपोर्ट आने के बाद अडानी समूह को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। अब भारतीय स्टॉक एक्सचेंज ने अडानी एंटरप्राइजेज सहित अडानी समूह की कम से कम तीन कंपनियों को बीएसई और एनएसई की निगरानी में डाल दिया है।अडानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और झटका लगने जा रहा है। S&P डाउ जोंस ने कहा है कि वह अडानी समूह की प्रमुख फर्म अडानी एंटरप्राइजेज को 7 फरवरी से अपने इंडेक्स से हटा देगा। डाउ जोंस ने तमाम मीडिया विश्लेषण और हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट आने के बाद पहली बार यह घोषणा की है।
]]>वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज बुधवार 1 फरवीर को थोड़ी देर में बजट पेश करने वाली हैं। केंद्रीय बजट 2023 इस साल बहुत मायने रखता है क्योंकि 2024 के आम चुनाव से पहले यह मोदी सरकार का आखिरी बजट है। 2019 के बाद से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पांचवीं बार सालाना बजट पेश कर रही हैं।
वित्त मंत्री निर्मला ने बजट 2023 पेश करने से पहले वित्त मंत्रालय गईं और फिर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से औपचारिक मुलाकात कर बजट के बारे में सारी जानकारी दी। अब बजट को कैबिनेट के सामने पेश किया जाएगा। वहां इसकी मंजूरी ली जाएगी। इसके बाद वो जल्द ही वो संसद में बजट पेश करेंगी।
शेयर बाजार मजबूती के साथ खुला और इसका अर्थ ये है कि बजट को लेकर लोगों का रुख पॉजिटिव है। शेयर बाजार 60000 के करीब पहुंचा।
2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोकस कम टैक्स दर, जबरदस्त श्रम सुधार, सब्सिडी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी सहित अन्य क्षेत्रों पर रहा है। निर्मला सीतारमण ने कल मंगलवार को इस वित्त वर्ष के लिए आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया था। जिसमें कोविड महामारी के बाद भारत में आर्थिक सुधार पूरा होने का दावा किया गया है। आने वाले वित्त वर्ष 2023-24 में अर्थव्यवस्था के 6 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत के दायरे में बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि इस वित्त वर्ष में 7 फीसदी और 2021-22 में 8.7 प्रतिशत की तुलना में यह काफी कम है।
]]>लेकिन नामों को बदलने का एक तर्क होता है, उसके पीछे राजनीतिक और सांस्कृतिक नीयत होती है। बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार जब नाम बदलने की राजनीति करती है तो उसकी भी एक नीयत दिखाई पड़ती है जो चिंताजनक है। वह मूलतः दो तर्कों का हवाला देती है- एक तर्क यह होता है कि गुलामी की स्मृति से मुक्ति पाने की ज़रूरत है और दूसरा तर्क यह होता है कि भारत का जो स्वर्णिम अतीत है, उसकी विरासत को जीवित रखा जाना ज़रूरी है।
लेकिन ये दोनों तर्क इस तथ्य की उपेक्षा करते हैं कि अतीत या स्मृति कोई कटी-छँटी चीज़ नहीं होती जिसे आप किसी पौधे की तरह अपने सांस्कृतिक गमले में सजा लें। उसका एक अविच्छिन्न सिलसिला होता है जिसमें बरसों नहीं, सदियों की हवा-मिट्टी और पानी का संस्पर्श शामिल होता है। बहुत संभव है कि इस अविच्छिन्नता में बहुत सारे तत्व आपको नापसंद हों या नागवार गुज़रें, लेकिन इतने भर से उनकी हक़ीक़त मिट नहीं जाती। ख़ास कर भारत जैसे देश में, जहाँ पांच हज़ार साल की एक अविच्छिन्न सभ्यता दिखाई पड़ती है, वहां स्मृति और विरासत के नाम पर यह खेल दरअसल इस सभ्यता की स्वाभाविकता को काटने का, उसे कमज़ोर करने का खेल बन जाता है।
जब मुग़ल गार्डन का नाम अमृत उद्यान किया जाता है, या जब इलाहाबाद को प्रयागराज बनाया जाता है या फिर जब मुग़लसराय को दीनदयाल उपाध्याय नगर में बदला जाता है तो ऐसे प्रयत्नों की अस्वाभाविकता बहुत साफ़ दिखाई पड़ती है। इलाहाबाद का प्रयागराज से कोई बैर नहीं है। दोनों साथ-साथ हम सबकी स्मृति में जीवित हैं। ऐसी साझा स्मृति का दूसरा उदाहरण बनारस और काशी हैं। लेकिन जब आप इलाहाबाद को मिटा कर प्रयागराज को स्थापित करना चाहते हैं तो दरअसल, आप स्मृति के एक हिस्से को- जो कम से कम एक हज़ार बरस का है- काट कर- उस संस्कृति का वर्चस्व बनाना चाहते हैं जो दरअसल फ़िलहाल कहीं अस्तित्व में नहीं है। इसके बाद इलाहाबाद पूछता है कि वह अपने अमरूदों का क्या करे, अपने उस विश्वविद्यालय को किस नाम से पुकारे जिसे कभी पूरब का ऑक्सफोर्ड कहते थे और अपने शायर अकबर इलाहाबादी को किस नए नाम से जाने, जिन्होंने अपनी शायरी में अंग्रेज़ियत और आधुनिकता दोनों की जम कर ख़बर ली थी।
ठीक है कि मुग़ल गार्डन के पास ऐसे सवाल नहीं होंगे। उसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं है। लेकिन मुग़ल गार्डन बोलते ही जो स्मृति सिर उठाती है, क्या अमृत उद्यान नाम से वैसी कोई स्मृति है?
ठीक है कि मुग़ल गार्डन के पास ऐसे सवाल नहीं होंगे। उसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं है। लेकिन मुग़ल गार्डन बोलते ही जो स्मृति सिर उठाती है, क्या अमृत उद्यान नाम से वैसी कोई स्मृति है?
अमृत उद्यान नाम दरअसल यह संदेह पैदा करता है कि सांस्कृतिक शुद्धतावाद की जिस अधकचरी अवधारणा को बीजेपी अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल की तरह स्थापित करने में लगी है, उसके तहत उसने एक तत्सम शब्द-युग्म के सहारे यह नाम चुन लिया है।
मगर यह संदेह फिर भी छोटा है। ज़्यादा बड़ा संदेह यह है कि दरअसल बीजेपी और संघ परिवार को पूरे मध्यकाल से समस्या है। इस मध्यकाल में संस्कृत नहीं बोली जाती, कबीर पंडितों और मुल्लों का मज़ाक बनाते हैं, मीरा प्रेम के नाम पर बग़ावत करती नज़र आती हैं, रसख़ान और जायसी कृष्णकथा कहते मिलते हैं और कुंभनदास और रैदास जैसे कवि अपने स्वाभिमान को अपना मूल्य बनाते हैं। इसी मध्यकाल में नानक मिलते हैं जो एक नया पंथ शुरू कर डालते हैं। इस मध्यकाल में ताजमहल, लाल क़िला और जामा मस्जिद जैसी शानदार इमारतें बनती हैं, अमीर खुसरो से लेकर तानसेन तक आते हैं। गांधी इसी मध्यकाल से प्रेरणा ग्रहण करते हैं, अपने भजनों की किताब में मध्यकाल का साहित्य भर डालते हैं और ख़ुद को जुलाहा बताते हैं।
बेशक, इस मध्यकाल में एक बड़ी सांस्कृतिक उपस्थिति तुलसीदास की भी है। कुल मिलाकर यह मध्यकाल एक बड़े सांस्कृतिक प्रतिरोध और उद्वेलन का काल भी है जो किसी काल्पनिक स्वर्णकाल से ज़्यादा ठोस, ज़्यादा निरंतर और हमारी आधुनिकता के ज़्यादा क़रीब है। मगर बीजेपी की शब्दावली में यह पूरा दौर ग़ुलामी का दौर है जिससे निजात पाने की ज़रूरत है।
बीजेपी की सारी समस्या यही है। उसे अपने सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए वह काल्पनिक रामराज्य चाहिए, जहां लोग संस्कृत बोलने वाले हों, मुग़ल गार्डन में नहीं, अमृत उद्यान में घूमते हों और पूजा-पाठ और यज्ञ से राक्षसों और दुष्टों को मार भगाने की विधियाँ विकसित करते हों।
लेकिन इतिहास के ठोस तथ्य बीजेपी की इस कल्पनाशीलता का साथ नहीं देते। उसे समझ में आता है कि इसके लिए उसे अपना इतिहास और अपना मध्यकाल गढ़ना होगा। इसलिए वह अतीत में जाकर नए नायकों की खोज करती है, राणा प्रताप या शिवाजी को हिंदुत्व के उद्धारकों की तरह प्रस्तुत करती है और बाबर-अकबर से लेकर औरंगजेब और बहादुरशाह ज़फ़र तक को ख़ारिज करने की कोशिश करती है। यह मुग़लिया इतिहास उसे ख़ास तौर पर परेशान करता है। इसलिए वह मुग़लसराय का नाम दीनदयाल उपाध्याय नगर रखते हुए एक अजब सी दलील देती है- कि इसी शहर के रेलवे प्लैटफॉर्म पर दीनदयाल उपाध्याय का शव मिला था। निश्चय ही यह दुखद था, उनका ऐसा अंत नहीं होना चाहिए था, लेकिन बस इस आधार पर एक शहर का नाम बदल देना कितना उचित है? उनकी स्मृति अक्षुण्ण रखने के लिए उनकी मूर्ति लगाई जा सकती थी, उनके नाम पर कुछ संस्थान बनाए जा सकते थे, लेकिन एक पूरे शहर से उसका नाम छीन लेना कितना जायज़ है?
मुग़ल गार्डन का नाम परिवर्तन भी इसीलिए परेशान करता है। वह सांस्कृतिक आरोपण की एक बड़ी प्रक्रिया का छोटा सा हिस्सा है। लेकिन इस सांस्कृतिक आरोपण से हम क्यों परेशान हैं? क्योंकि बीजेपी यह जो नया सांस्कृतिक उद्यान बना रही है, उसमें बहुत सारे हिंदुस्तानियों के लिए जगह नहीं दिखती या दोयम दर्जे की जगह दिखती है। इस देश के दलित, आदिवासी, पिछड़े या अल्पसंख्यक इस सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के आगे या तो ख़ुद को असहाय पा रहे हैं या फिर छोटी-छोटी लड़ाइयाँ लड़ रहे हैं- उनके सामने उनके वजूद और गुज़ारे का संकट बड़ा होता जा रहा है।
मुग़ल गार्डन कोई जनता की चीज़ नहीं है। वह राष्ट्रपति भवन का हिस्सा है जिसे साल में एक बार आम लोगों की सैर के लिए खोला जाता है। लेकिन उसकी जगह जो अमृत उद्यान आ गया है, उसका नाम ही बहुत सारे लोगों को इसमें प्रवेश के लिए सांस्कृतिक तौर पर अनधिकृत या अवांछित बना डालता है। वैसे, एक सच यह भी है कि सरकारी नाम बदल जाने से जगहों के प्रचलित नाम आसानी से ख़त्म नहीं हो जाते। समय भी उन्हें एक मान्यता देता है। कनॉट प्लेस को राजीव चौक मिटा नहीं पाया, चांदनी चौक का कोई और नाम उसे बदल नहीं पाएगा, इलाहाबाद प्रयागराज के साथ बचा रहेगा और अमृत उद्यान के अलावा लोगों को मुग़ल गार्डन भी याद आता रहेगा। मगर सांस्कृतिक आरोपण के इस प्रयत्न के प्रतिरोध में इतनी भर तसल्ली पर्याप्त नहीं है, उसके व्यापक निहितार्थ समझने और उसकी काट खोजने की ज़रूरत है।
]]>84.4 बिलियन डॉलर की वर्तमान संपत्ति के साथ, अडानी अब प्रतिद्वंद्वी और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के अध्यक्ष मुकेश अंबानी से सिर्फ एक स्थान ऊपर हैं, जिनकी कुल संपत्ति 82.2 बिलियन डॉलर है।
हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट सामने आने के बाद अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में तीन दिनों की बिकवाली में गिरावट आई है, जिसने $68 बिलियन से अधिक की मार्केट वैल्यू को खत्म कर दिया है। हालांकि अडानी समूह ने हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे भारत पर हमला बताया था। लेकिन हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी की सफाई पर कहा कि अडानी भारत को बहुत व्यवस्थित ढंग से लूट रहे हैं। अडानी समूह इसे राष्ट्रवाद की आड़ में नहीं छिपाएष
अरबपतियों के सूचकांक में अडानी अब मैक्सिको के कार्लोस स्लिम, गूगल के सह-संस्थापक सर्गेई ब्रिन और माइक्रोसॉफ्ट के पूर्व सीईओ स्टीव बाल्मर से नीचे हैं।
अमेरिका की जानी-मानी निवेश शोध फर्म हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी समूह पर स्टॉक बाज़ार में हेरफेर करने का सनसनीखेज आरोप लगाया था। इसने कहा कि अडानी समूह एक स्टॉक में खुलेआम हेरफेर करने और अकाउंट की धोखाधड़ी में शामिल था। हिंडनबर्ग रिसर्च के इस आरोप पर अडानी समूह ने कहा है कि दुर्भावनापूर्ण, निराधार, एकतरफा और उनके शेयर बिक्री को बर्बाद करने के इरादे ऐसा आरोप लगाया गया है। इसने कहा है कि अडानी समूह आईपीओ की तरह ही फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफ़र यानी एफ़पीओ ला रहा है और इस वजह से एक साज़िश के तहत कंपनी को बदनाम किया जा रहा है।
हिंडनबर्ग अमेरिका आधारित निवेश रिसर्च फर्म है जो एक्टिविस्ट शॉर्ट-सेलिंग में एकस्पर्ट है। रिसर्च फर्म ने कहा कि उसकी दो साल की जांच में पता चला है कि “अडानी समूह दशकों से 17.8 ट्रिलियन (218 बिलियन अमेरिकी डॉलर) के स्टॉक के हेरफेर और अकाउंटिंग की धोखाधड़ी में शामिल था।
रिसर्च फर्म की रिपोर्ट के मुताबिक अदानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी ने पिछले तीन सालों के दौरान लगभग 120 अरब अमेरिकी डॉलर का लाभ अर्जित किया है जिसमें से अडानी समूह की सात प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के स्टॉक मूल्य की बढ़ोत्तरी से 100 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक कमाये। जिसमें पिछले तीन साल की अवधि में 819 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हुई।
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट कैरेबियाई देशों, मॉरीशस और संयुक्त अरब अमीरात तक फैले टैक्स हैवन देशों में अडानी परिवार के नियंत्रण वाली मुखौटा कंपनियों के नेक्सस का विवरण है। जिसके बारे में दावा किया गया है कि इनका इस्तेमाल भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और करदाताओं की चोरी को सुविधाजनक बनाने के लिए किया जाता है। जबकि धन की हेराफेरी समूह की सूचीबद्ध कंपनियों से की गई थी।
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